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बज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान

posted Apr 17, 2011, 10:20 PM by Site Designer   [ updated Apr 17, 2011, 10:44 PM ]

बज्र देह दानव दनल महाबीर हनुमान
जब बक्तों के प्यारे बजरंगबली पैदा हुए थे, शिव ने भक्तों की रक्षा के लिए व भगवान् राम जी की सेवा व राम काज को पूरा करने के लिए मृत्यु लोक अर्थात पृथ्वी पर पवनदेव के तेज से बानर राज केसरी और रानी अंजनी के घर जन्म लिया, अत्यंत बलशाली होने के कारण नाम पड़ा महाबीर बजरंगबळी, बाल्यकाल से अद्भुत सिद्धियाँ होने व पवन पुत्र होने के कारण हवा में उड़ने व किसी भी लोक तक चले जाने की क्षमता उनमें थी, बाल्यकाल से ही उनहोंने कई राक्षसों का बध करना शुरू कर दिया था, सूर्य को आकाश में देख कर उसे निगल लिया तब सभी देववी देवताओं नें प्रार्थना कर उनसे सूर्य को मुक्त करने को कहा तो बजरंगबळी ने सूर्य को बाहर उगला, सूर्य भगवान् नें प्रसन्न हो कर उनको अपना शिष्य बना लिया, भगवान् सूर्य जैसे गुरु से ज्ञान पा कर महाबीर का सामना करने का साहस तीनों लोकों में किसी के पास नहीं रहा, लेकिन महाबीर बालक होने के कारण अक्सर तपस्यारत र्तिशी मुनियों से भी छेड़ छाड़ करते कुपित हो कर ऋषियों ने उनको शक्तियां भूल जाने का शाप दिया, क्षमा याचना पर ऋषियों नें कहा की समय अनुसार आवशयकता पड़ने पर तुम्हारी शक्तियां वापिस आ जाएँगी, जब राम जी को माता सीता का वियोग हुआ तब हनुमान जी से उनका मिलन हुआ, राम लक्ष्मण को कन्धों पर उठा कर वायु मार्र्ग से सुग्रीव तक ले गए,समय आने पर महाबीर ने लंका कूद कर पार कर ली, मार्ग में आने वाली बाधाओं व परीक्षाओं को धैर्य व नीति पूर्वक पूरण किया, अशोक वाटिका उजाड़ कर राक्षस वीरों को स्वर्ग पहुंचाया, मरणासन लक्ष्मण को बचाने के लिए हिमालय पर्वत से एक पहाड़ ही उठा कर ले आये, जब मेघनाद नें भगवान् राम और लक्षमण को नागपाश में बाँध लिया तब वैकुण्ठ जा कर गरुड़ जी को ले कर आये, युद्ध में कई वीरों को यमलोक पहुंचाया, सीता माता की सबसे पहले सुधि लाने वाले हनुमान जी ही थे, अयोध्या वासियों तक सीता राम के आगमन का उनहोंने ही समाचार पहुँचाया, रावण की कैद से शनि को मुक्त करवाया, जब शनि नें पिता से अभद्रता की तो, सूर्य के कहने पर शनि को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और भगवान् सूर्य के सामने उपस्थित कर दिया, सीता माता द्वारा दी गयी मोतियों की माला को तोड़ कर दरवारियों के कहने पर हन्मुमान जी नें सीना चीर दिया और अपने प्रब्न्हू राम सीता की युगल मूर्ती के दर्शन संसार को करवाए, लवकुश से युद्ध के दौरान बुद्धि संयम का अद्भुत परिचय दिया, बालकों के पाश में बांध गए, भगवान् राम जी के सरयू नाड़ी में सनान्न के बाद वैकुण्ठ लौटने पर भी महाबीर भक्तों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए पृथवी पर ही रहे, रामायणकाल के अतिरिक्त महाभारतकाल में जब भीम को अपने बल का घमंड हो गया तो हनुमान जी नें उनको कहा कि भीम तुम मेरी पूंछ उठा कर एक और कर दो, लेकिन पूरा प्रयास करने पर भी भीम पूंछ को हिला तक नहीं पाए, भगवान् श्रीकृष्ण जी और अर्जुन के रथ पर ध्वजा में स्वयं महाबीर उपस्थित रहे, इसीलिए युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ धमाके के साथ नष्ट हो गया, क्योंकि हनुमान जी नें रथ को छोड़ दिया था, कलियुग में भी हनुमान जी जीवित ही माने जाते है क्योंकि उनको चिरंजीवी होने का आशीर्वाद मिला है, महाभारत के अनुसार महाबीर हनुमान आज भी गंधमादन नाम के पर्वत पर रहते हैं, कहा जाता है की जहाँ जहाँ रामायण का पाठ होता है हनुमान जी सूक्ष्म रूप या प्रत्यक्ष रूप में जरूर वहां आते हैं, कलियुग में गोस्वामी तुलसीदास जी को राम लक्ष्मण जी के दर्शन भी हनुमान जी ने ही करवाए थे, हनुमान जी का इतना बल है की पातळ में अहिरावन को मार कर महाबीर हनुमान जी नें उसकी भुजाएं ही उखाड़ ली थी, ज्ञानियों में प्रथम रहने वाले, भक्तों को ज्ञान देने वाले, भूत प्तेतों का नाश करने वाली महाबीर का सुमिरन ही सब दुखों का नाश करने वाला है, नीच ग्रह यक्ष, किन्नर,किरात आदि सब इनके भय से थर-थर कांपते हैं, तो मान्गियें शीघ्र प्रसन्न होने वाले हनुमान जी से सकल मनोरथ, मानिये हनुमान जी को और शत्रुओंका रोगों का दुखों का नाश कीजिये, पाइए धन वैभव, नीच ग्रहों से मुक्ति पा कर सुखद जीवन का आशीर्वाद पाइए
                                                              शत्रु नाश के लिए, रोग मुक्ति के लिए, रोजगार व व्यापार में लाभ के लिए,विद्या व बुद्धि के लिए, बलशाली शरीर के लिए,शनि मंगल राहु केतु जैसे नीच ग्रहों से मुक्ति के लिए, अकाल मृत्यु व दुर्घटना आदि से बचाव, हनुमान जी की कृपा पाने व दर्शन करने के लिए महामंत्र

ॐ हं हनुमते नम:

हनुमान गायत्री

शाबर स्तुति मंत्र

स्तुति मंत्र


-कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ 

सप्तम नवरात्र-वर देंगी महाशक्ति कालरात्रि

posted Apr 9, 2011, 5:19 AM by Site Designer   [ updated Apr 13, 2011, 12:03 PM ]

सप्तम नवरात्र 
वर देंगी महाशक्ति कालरात्रि  
मार्कंडेय पुराण के अनुसार सप्तम नवरात्र की देवी का नाम कालरात्रि है, शिव ने सृष्टि को बनाया शिव ही इसे नष्ट करेंगे, शिव की इस महालीला   में जो सबसे गुप्त पहलू है वो है कालरात्रि, प्राचीन कथा के अनुसार एक बार शिव नें ये जानना चाहा कि वे कितने शक्तिशाली हैं, सबसे पहले उनहोंने सात्विक शक्ति को पुकारा तो योगमाया हाथ जोड़ सम्मुख आ गयी और उनहोंने शिव को सारी शक्तियों के बारे में बताया, फिर शिव ने राजसी शक्ति को पुकारा तो माँ पार्वती देवी दुर्गा व दस महाविद्याओं के साथ उपस्थित हो गयीं, देवी ने शिव को सबकुछ बताया जो जानना चाहते थे, तब शिव ने तामसी और सृष्टि कि आखिरी शक्ति को बुलाया तो कालरात्रि प्रकट हुई, काल रात्रि से जब शिव ने प्रश्न किया तो कालरात्रि ने अपनी शक्ति से दिखाया कि वो ही सृष्टि कि सबसे बड़ी शक्ति हैं गुप्त रूप से वही योगमाया, दुर्गा पार्वती है, एक क्षण में देवी ने कई सृष्टियों को निगल लिया, कई नीच राक्षस पल बर में मिट गए, देवी के क्रोध से नक्षत्र मंडल विचलित हो गया, सूर्य का तेज मलीन हो गया, तीनो लोक भस्म होने लगे, तब शिव नें देवी को शांत होने के लिए कहा लेकिन देवी शांत नहीं हुई, उनके शरीर से 64  कृत्याएं पैदा हुई, स्वर्ग सहित, विष्णु लोक, ब्रम्ह्म लोक, शिवलोक व पृथ्वी मंडल कांपने लगे, 64 कृत्याओं ने महाविनाश शुरू कर दिया, सर्वत्र आकाश से बिजलियाँ गिरने लगी तब समस्त ऋषि मुनि ब्रह्मा-विष्णु देवगण कैलाश जा पहुंचे शिव के नेत्रित्व में सबने देवी की स्तुति करते हुये शांत होने की प्रार्थना, तब देवी ने कृत्याओं को भीतर ही समां लिया, सभी को उपस्थित देख देवी ने अभय प्रदान किया, सबसे शक्तिशालिनी देवी ही कालरात्रि हैं जो महाकाली का ही स्वरुप हैं, जो भी साधक भक्त देवी की पूजा करता है पूरी सृष्टि में उसे अभय होता है, देवी भक्त पर कोई अस्त्र शास्त्र मंत्र तंत्र कृत्या औषधि विष कार्य नहीं करता, देवी की पूजा से सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं 

                                                             शिव ने सबसे बड़ी शक्ति को को जानने के लिए जिस देवी को उत्पन्न किया वही कालरात्रि हैं, महाशक्ति कालरात्रि स्वयं योगमाया ही हैं जो सृष्टि का आदि थी अब अंत है, उतपन्न करने तथा महाविनाश की शक्ति होने से प्रलय काल की भाँती देवी को कालरात्रि कहा गया है, देवी के उपासक के जीवन में कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता, देवी कि स्तुति करने वाले भक्त पर देवी शीघ्र प्रसन्न हो कृपा बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए सातवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का पाठ करना चाहिए  
पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें, 

महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे 
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन का प्रमुख मंत्र है, 

मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै नम:

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें, 

जैसे मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै स्वाहा:

माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा हकीक की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ 

            यन्त्र-
          090     010     070
          080     030     020
          040     050     060

यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को काले रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, कालरात्रि देवी का श्रृंगार काले वस्त्रों से किया जाता है, लाल रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा रात्री को ही की जा सकती है, संध्या की पूजा का समय देवी कूष्मांडा की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी शाम के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक व चौमुखा दिया जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को नारियल व उर्द की ड़ाल काली मिर्च आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में मीठी रोटी का भोग चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र में देवी का ध्यान करने से सातवां चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में अदरक का रस , लौंग व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए, 

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, सातवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा समुद्र का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे शत्रुओं कि समस्या हो या बार बार धन हानि होने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं , देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ तृम तृषास्वरूपिन्ये चंडमुण्डबधकारिनयै नम:(न आधा लगेगा)
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें 
व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें 
ॐ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोकस्याखिलेश्वरी 
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरीविनाशनम  

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा सातवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी कालिका शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज सातवें नवरात्र को सात कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ भोजन पात्र जैसे थाली गिलास आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, सातवें नवरात्र को अपने गुरु से "सह्स्त्रहार भेदन दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन की पूरनता को अनुभव कर सकें व वैखरी वाणी की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, सातवें नवरात्र पर होने वाले हवन में पंचमेवा व काली मिर्च की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले सातवें नवरात्र का ब्रत ठीक आठ बाबन पर खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर व फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को लाल पीले व चमकीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और लाल पीले व चमकीले वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए 
 
-कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

चतुर्थ नवरात्र-वर देंगी महाशक्ति कूष्मांडा

posted Apr 6, 2011, 8:24 AM by Site Designer   [ updated Apr 6, 2011, 8:32 AM ]

चतुर्थ नवरात्र 
वर देंगी महाशक्ति कूष्मांडा 
मार्कंडेय पुराण के अनुसार चतुर्थ नवरात्र की देवी का नाम कूष्मांडा देवी है, प्राचीन कथा के अनुसार जब ये ब्रह्माण्ड बना ही नहीं था, तब माँ योगमाया ने सृष्टि की उत्त्पति के लिए ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया, किन्तु ब्रह्मा जी तो मन में कामना करते की ऐसी सृष्टि पैदा हो लेकिन उसे पूरा कैसे किया जाए तो योगमाया से ब्रह्मा जी ने सहायता मांगी,देवी को स्तुति से प्रसन्न कर ब्रह्मा जी को देवी से सृष्टि निर्माण की कला प्राप्त हुई, तब देवी ने सबसे पहले अंड अर्थात ब्रह्माण्ड पैदा किया, तथा सृष्टि में गर्भ के अतिरिक्त अण्डों से जीवन पैदा करने की शक्ति भी ब्रह्मा जी को दी, स्वयं भी देवी करोड़ों सूर्य के सामान तेजस्वी स्वरुप में, ब्रहमां में सूर्य मंडल के भीतर स्थित रहती हैं, ऐसी सामर्थ्य देवी के अतिरिक्त किसी और में नहीं है, देवी आठ भुजाओं वाली हैं, जिनमें कमल पुष्प, धनुष, तीर, कमंडल, चक्र, गदा,माला तथा अमृत कलश है धारण किये हुये हैं व सिंह के आसन पर सवार हैं, देवी साधक को अमरत्व का वरदान देने में समर्थ हैं, इच्छा मृत्यु का वर देने वाली देवी, साधक के सब दुखों को हरने में क्षण मात्र भी देर नहीं करती, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी पारलौकिक विद्याओं की जननी है, जीवन को धर्म एवं कृपा से भर देने में सामर्थ है 

                                                                                  ब्रह्माण्ड को पैदा करने के कारण देवी का नाम पड़ा कूष्मांडा, महाशक्ति कूष्मांडा  योगमाया का दिव्य तेजोमय स्वरुप हैं जो सृष्टि को पैदा करने के लिए उत्पन्न हुआ, संसार में अण्डों से जीवन की उत्त्पत्ति कराने की शक्ति ब्रह्मा जी को देने के कारण भी देवी को कूष्मांडा कहा जाता है, देवी के उपासक अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं तथा इछामृतु का वर देने वाली यही देवी हैं, देवी भक्ति, आयु, यश, बल, आरोग्य देने में जरा भी बिलम्ब नहीं करती, देवी को प्रसन्न करने के लिए चौथे नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पांचवें व छठे अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें 
महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे 
(शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी कूष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए तीसरे दिन का प्रमुख मंत्र है 

मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै नम:

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें 

जैसे मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं कूष्मांडा देव्यै स्वाहा:

माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ 

 यन्त्र-
          775      732     786
          151      181      102
          762      723      785

 
यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को भगवे रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, चंद्रघंटा देवी का श्रृंगार भगवे रंग के वस्त्रों से किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को केसर, लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा कभी भी की जा सकती है, रात्री की पूजा का देवी कूष्मांडा की साधना के लिए ज्यादा महत्त्व माना गया है 
मंत्र जाप के लिए भी संध्या व रात्री मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए एक बड़ा घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व कलश को लाल कपडे से ढक कर रखें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

मंत्र-ॐ जूं ह्रीं ऐं

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को भगवे वस्त्र, रुद्राक्ष माला तथा गेंदे के फूलों का हार आदि अर्पित करना चाहिए 
मंदिर में भगवे रंग की ध्वजा चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, अनाहत चक्र में देवी का ध्यान करने से चौथा चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में कपूर व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै  

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, चौथे दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और दो अन्य नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे संतान प्राप्ति की समस्या हो या विदेश यात्रा की, या पद्दोंन्ति की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

ॐ क्षूं क्षुधास्वरूपिन्ये देव बन्दितायै नम:

नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें 

ॐ शरणागतदीनार्त परित्राणपरायणे 
सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणी नमोस्तुते  
  
यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा चौथे नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी गुफा वाले शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज चौथे नवरात्र को चार कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ आभूषण देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, चौथे नवरात्र को अपने गुरु से "ब्रहमांड दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप देवत्व प्राप्त कर लेते हैं व ब्रह्म विद्या की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, चौथे नवरात्र पर होने वाले हवन में काले तिलों की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले चौथे नवरात्र का ब्रत ठीक सात पंद्रह बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर का प्रसाद बांटना चाहिए
आज सुहागिन स्त्रियों को भगवे अथवा पीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और भगवे या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए 
 
-कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

प्रथम नवरात्र -वर देंगी महाशक्ति शैल पुत्री

posted Apr 6, 2011, 7:34 AM by Site Designer   [ updated Apr 6, 2011, 8:09 AM ]

प्रथम नवरात्र 
वर देंगी महाशक्ति शैल पुत्री 
मार्कंडेय पुराण के अनुसार प्रथम नवरात्र की देवी का नाम शैलपुत्री देवी है, इन शैलपुत्री देवी को गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में हम जानते हैं, शैलपुत्री के नाम से माँ पार्वती जी को त्रिलोकी भर में पूजा जाता है, और यही देवी सबकी अधीश्वरी है, एक समय की बात है कि पर्वत राज हिमालय ने  कठोर तप कर माँ योगमाया को प्रसन्न किया, जब योगमाया के उनको दिव्य दर्शन हुये तो माता ने हिमालय को वर माँगने को कहा, तब पर्वत राज हिमालय ने योगमाया से कहा कि वे उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेँ, माता ने प्रसन्न हो कर पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लिया, हिमालय की  पुत्री पार्वती के रूप में हिमाचल के घर पैदा हुई, पर्वत राज की पुत्री होने के कारण व कठोर तपस्वी सवभाव के कारण उनका नाम शैल पुत्री पड़ गया, माता शैल पुत्री का भक्त जीवन में कभी हारता नहीं, दुःख कोसों दूर से भक्त को देख कर भाग जाते हैं, शैल पुत्री के भक्त दृद निश्चयी, विश्वविजेता होते हैं, यदि आप सदा भयभीत रहते हों, जीवन कि सही दिशा नहीं ढून्ढ पा रहे हों, उदास जीवन में कोई सहारा न बचा हो, सब और शत्रु ही शत्रु हो गए हों, तो माता को मनाने का सबसे सही वक्त आ गया है, अब माता की पूजा आपकी सदा रक्षा करेगी,शुम्भ-निशुम्भ जैसे राक्षसों का नाश करने वाली देवी आपके जीवन के सब संकट हर लेगी, नवरात्रों में देवी स्वयं भक्तों के पास चल कर आती हैं, केवल उनको सच्चे मन से पुकारने की जरूरत होती है, आज हम आपको बताएँगे कि कैसे होंगी देवी शैलपुत्री प्रसन्न, वो कौन से मंत्र हैं जो माँ को खींच कर आपकी और ले आयेंगे, वो कौन सा यन्त्र हैं जिसकी सथापना से शैलपुत्री की सथापना हो जायेगी, किस रंग के वस्त्र माता को पहनाएं अथवा माता का श्रृंगार कैसे करें ? यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो आज हम आपको बताएँगे सही बिधि-बिधान जो माता कि कृपा ले कर आएगा

 

हिमालय के घर पैदा होने के करण देवी का नाम पड़ा शैलपुत्री,शैलपुत्री माँ पार्वती जी का ही नाम है , कठोर तपस्वी स्वभाव के कारण भी देवी को शैल पुत्री कहा जाता है , देवी शैलपुत्री का भक्त जीवन में कभी नहीं हारता, देवी का नाम भर लेने से दुःख कोसों दूर से भाग जाते हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए पहले नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय का पाठ करना चाहिए, जब भी पाठ करें तो पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर कवच का अर्गला स्तोत्र फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करना चाहिए, सकाम इच्छा के लिए तो विशुद्ध संस्कृत में ही पाठ होना चाहिए लेकिन निष्काम भक्त हिंदी में व संस्कृत दोनों में पाठ कर सकते हैं, यदि आप किसी मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का भी पाठ करें, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो देवी के नवारण महामंत्र का जाप पूरे नवरात्र भर करते रहें 

महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

देवी शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए पहले दिन का प्रमुख मंत्र है 
मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं शैलपुत्री देव्यै नम:

दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें 
जैसे मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं शैलपुत्री देव्यै स्वाहा:

माता के मात्र का जाप करने के लिए स्फटिक या रत्नों से बनी माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर रुद्राक्ष माला या मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ पर बना लेँ 
 यन्त्र-
          578      098      395
          842      576      998
          224      862      627

यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को गुलाबी रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, शैलपुत्री देवी का श्रृंगार गुलाबी रंग के वस्त्रों से किया जाता है, इसी रंग के फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को लाल चन्दन, सिंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की पूजा सुबह और शाम दोनों समय की जाती है, शाम की पूजा मध्य रात्री तक होती है और रात्री की पूजा का ही सबसे ज्यादा महत्त्व माना गया है 
मंत्र जाप के लिए भी रात्री के समय का ही प्रयोग करें, यदि आप पूरे नवरात्रों की पूजा कर रहे हों तो एक अखंड दीपक जला लेना चाहिए, देवी की पूजा में नारियल सहित कलश स्थापन का बड़ा ही महत्त्व है, आप भी एक कलश में गंगाजल भर कर अक्षत (चाबलों) की ढेर पर इसे स्थापित करें, पूजा स्थान पर एक भगवे रंग की ध्वजा जरूर स्थापित करें जो सब बाधाओं का नाश करती है, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें 
यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पहले नवरात्र देवी के बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए, 

मंत्र-ॐ ग्लौम ह्रीं ऐं

मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी के वाहन बृषभ यानि कि बैल कि पूजा करनी चाहिए तथा बैलों को भोजन घास आदि देना चाहिए, मंदिर में त्रिशूल दान देने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी कि कृपा भी प्राप्त होती है, मूलाधार चक्र में देवी का ध्यान करने से प्रथम चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए

चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै  

ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, पहले दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल और तीन नदियों का जल लाना बहुत बड़ा पुन्य माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए 
नवरात्रों में तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, सुहागिन स्त्रियों को श्रृंगार करके व मेहंदी आदि लगा कर ही सौभाग्यशालिनी बन ब्रत व पूजा करनी चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे घर, वाहन, की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, 
देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र
ॐ ह्रीं रेत: स्वरूपिन्ये मधु कैटभमर्दिन्ये नम:
नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें 
व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें 
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसी देवी भगवती ही सा
  बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति  

यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा पहले नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी परवत पर स्थित शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज प्रथम नवरात्र को एक कन्या का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ पत्थर का एक शिवलिंग देना चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, प्रथम नवरात्र को अपने गुरु से "बज्र दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप पूर्व जन्म की स्मृति व भविष्य बोध की स्मृति शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, प्रथम नवरात्र पर होने वाले हवन में गुगुल की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व गूगुल जलना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले प्रथम नवरात्र का ब्रत सवा आठ बजे खोलेंगे,ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर बूंदी का प्रसाद बांटना चाहिए, श्रृंगार अवश्य करें,किन्तु अति और अभद्र श्रृंगार से बचाना चाहिए न ही ऐसे वस्त्र धारण करने चाहिए, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए 
 
-कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ 

आइये बिन्दुओं में जाने कैसे हों शिव प्रसन्न

posted Mar 18, 2011, 2:18 AM by Site Designer   [ updated Mar 18, 2011, 3:07 AM ]

शिव का ॐ कार स्वरुप में ध्यान करने से शिव सकल फल देते हैं
शिवलिंग के रूप में उपासना करने से भोग एवं मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं 
शिवलिंग पर पंचामृत चढ़ाना सर्वोत्तम माना जाता है 
शहद दूध और जल में चन्दन का लेप मिला कर अभिषेक से शिव प्रसन्न होते हैं 
रुद्राक्ष धारण करने से व उनकी प्राण प्रतिष्ठा से शिव के तेज का स्थापन जागरण होता है 
शिव संगीत व नृत्य प्रिय हैं गा कर व नृत्य से शिव प्रसन्न होते हैं 
शिवलिंग पर भस्म को त्रन्त्रोक्त बीजों सहित लेपन से सारे पाप मिट जाते हैं
भस्मलेपन का तंत्रोक्त बीज मंत्र-ॐ ह्रौं ज़ूम सः 
रक्त चन्दन अथवा विशेष निर्मित त्रिपुंड स्वयं और शिवलिंग पर लगाने से बाधाओं का नाश होता है 
त्रिपुंड का मंत्र-ॐ त्रिलोकिनाथाय नम:
शिव को प्रसन्न करने के लिए डमरू जरूर बजाएं और बम बम भोले बम बम भोले कहने से कृपा मिलेगी 
बिल्व पत्र व बिल्व फल चढाने से धन की प्राप्ति के साथ साथ शिव को सरलता से रिझाया जा सकता है 
शिवरात्रि पर धतुरा,भांग,और आक चढ़ना शिव की पूरी साधना करने के बराबर फलदायी होता हैं 
शिलिंग को प्रतिष्ठित कर करें शिवलिंग का पूजन तो जीवन सफल हो जाता है 
ज्ञान एवं विद्वत्ता की इच्छा वाले साधकों को स्फटिक के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए 
गृहस्थ सुख चाहने वालों को पत्थर के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए 
मुकद्दमों एवं युद्ध में प्रतियोगिताओं में सफलता पाने वालों को अष्ट धातु शिवलिंग का पूजन करना चाहिए 
सब सुख चाहने वाले को सोने चांदी अथवा रत्नों से बना शिवलिंग पूजना चाहिए 
सबसे स्रेष्ठ तो केवल पारे का शिवलिंग होता है जिसकी पूजा से जन्म मरण से मुक्ति प्राप्त होती है शिव की अमोघ कृपा बरसती है 
शिवरात्री के दिन शिव मंदिर के दर्शन,कैलाश मानसरोवर के दर्शन,शिवभक्तों के दर्शन अथवा सुमिरम से शिव भोले बरदान देते हैं 
शिवरात्रि को शिवपुराण की पूजा और पाठ से शिव प्रसन्न हो कर अपने भक्त के साथ साथ रहने लगते हैं 
इस पुराण में 24,000 श्लोक है तथा इसके क्रमश: 6 खण्ड है
पहला खंड -विद्येश्वर संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से समस्त भयों और अपशकुनो का नाश होता है 
दूसरा खंड-रुद्र संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से अकाल मृत्यु टलती है और ज्ञान प्राप्त होता है 
तीसरा खंड-कोटिरुद्र संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से भौतिक सुखों के साथ साथ अद्यात्म का ज्ञान भी मिलता है 
चौथा खंड-उमा संहिता कहलाता है-जिसके पाठ से शक्ति सिद्धियाँ तो मिलती ही हैं मायाजाल से बक्त मुक्त हो जाता है 
पांचवा खंड-कैलास संहिता-जिसके पाठ से साधक मानव योनी से उपार हो कर शिव का गण हो जाता है तीनो लोकों में उसे निर्भयता प्राप्त होती है 
छठा खंड-वायु संहिता-जिसके पाठ से धार अर्थ काम सहित मोक्षः मिलता है साधक शिव में समाहित हो पूरण हो जाता है 
शिव को स्तुति प्रिय है अतः स्तुतियों से करें शिव आराधना 
शिव सहस्त्रनामावली का पाठ करें 
शिव की सबसे प्रचलित स्तुति है



ॐ कर्पूर गौरं करुणावतारं
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं
सदा वसन्तं हृदयारवृन्दे
भवं भवानी सहितं नमामि !!



देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व सब शिव को गा कर प्रसन्न करते है 
रुद्राष्टक,पंचाक्षर,मानस,द्वादश ज्योतिर्लिंग जैसे स्तोत्रों का पाठ करने से अद्भुत कृपा प्राप्त होगी 
सस्कृत स्तोत्र शीग्र फलदायी होते हैं 
रुद्राष्टक स्तोत्र कुछ ऐसे है-
नमामिशमीशान निर्वाण रूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्किल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं।
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसारपारं नतोहं।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं।
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।

कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ 




 


मीठी सी निदिया-स्वप्नेश्वरी देवी

posted Mar 18, 2011, 1:32 AM by Site Designer   [ updated Mar 18, 2011, 2:43 AM ]

क्या आप रात भर सोते नहीं ? सुबह जल्दी उठ भी नहीं पाते ? हमेशा उंघते रहते हैं ? क्या हमेशा आलस्य छाया रहता हैं? अनेक रोगों से घिरे हुए हैं? क्या आप अनिद्रा के शिकार हैं ! सोने के लिए दवाओं का सहारा लेते हैं? तो कीजिये स्वप्नेश्वरी देवी को प्रसन्न और खो जाइये मीठे सपनों के संसार में.......हमें नींद के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं होती, ये हमारी दिनचर्या का एक हिस्सा है,लेकिन आधुनिक जीवन शैली के कारण ज्यादातर लोग कभी न कभी नींद न आने की परेशानी से सामना करते है,जिसे आनिद्र भी कहा जाता है(Insomnia), अगर आप कभी बहुत चिन्तित हों या बहुत उत्तेजित हों तो कुछ समय के लिए आप इसके शिकार हो सकते हैं और जब ये उत्तेजना या चिन्ता खत्म हो जाती है तो नींद भी दुबारा सामान्य हो जाती है, अगर आपको अच्छी नींद नही आती है तो ये एक समस्या है क्योंकि नींद आपके शरीर और दिमाग को स्वस्थ एवं चुस्त रखती है| नींद हर 24 घंटे में नियमित रुप से आने वाला वो समय है जब हम अचेतन अवस्था मे होते है, और आस पास की चीजों से अनजान रहते है ,हम सपने देखते है,एक सामान्य रात में आप लगभग हर दो घंटे पर1-2 मिनट के लिये जगते हैं,आप सामान्यतः इस जगने के बारे में नहीं जान पाते,हमें कितनी नींद की आवश्यकता होती है ? यह उम्र पर निर्भर है,बच्चे -17 घन्टे,किशोर - 9 से 10 घन्टे,व्यस्क - 8 घन्टे,वृद्ध - व्यस्क के समान,समान उम्र के लोगों के बीच मे भी अन्तर पाया जाता है,अधिकांश लोग 8 घन्टे सोते हैं जबकि कुछ लोगों के लिये 3 घन्टे की नींद ही पर्याप्त होती है,जब नींद नहीं आती है तो चिन्ता और तनाव बढ़ाने लगता है,अगर आप एकाध रात न सोएं तो अगले दिन आप थका हुआ मह्सूस करेंगे, दिन भर झपकी लेंते रहेंगें, ध्यान नही लगा पायेंगे,निर्णय लेने में दिक्कत होगी,उदासी मह्सूस होगी,गंभीर रूप से बीमार पड़ सकते हैं,आप अगर वाहन चलाते हैं या मशीनों पर काम करते हैं तो यह खतरनाक हो सकता है,अनिद्रा से उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मोटापा जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं,-कभी कभी आप महसूस करते हैं कि आपने पूरी नींद नहीं ली है या पर्याप्त समय सोने के बाद भी आपको ताजगी महसूस नहीं होती,जिसके कई कारण हो सकते हैं, शयनकक्ष में बहुत शोर हो या बहुत ठंडा या बहुत गर्म हो ,बिस्तर छोटा हो या आरामदायक ना हो ,आपकी सोने की कोई नियमित दिनचर्या न हो ,आपको पर्याप्त थकान न होती हो या आप पर्याप्त परिश्रम न करते हो, आप बहुत देर में खाना खाते हो,आप भूखे पेट ही सोने के लिए चले जाते हों ,सोने से पूर्व चाय, काफी (जिनमे कैफीन नामक रसायन होता है), सिगरेट या शराब का सेवन करते हों, लेकिन इन सभी से बचने का उपाय है, वो है गहरी नींद में सोना,और नींद आने का मंत्र हम आपको बताएँगे,लेकिन मंत्र से पहले ये जान लेते है कि निद्रा कि देवी कौन है,जी हाँ निद्रा कि देवी,निद्रा कि देवी हैं माँ स्वप्नेश्वरी,कैसे उत्पन्न हुयी है सपनों के संसार कि ये देवी आइये जानते हैं मार्कंडेय पुराण कि इस कथा से----------"सृष्टि के आरम्भ में हर ओर जल ही जल था और उस जल में भगवान् विष्णु शेष नाग की शैय्या पर योगनिद्रा में सोये हुए थे,उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ जिस पर ब्रह्मा जी बैठे हुए थे,अचानक भगवान् विष्णु जी के कानों की मैल से दो भयानक राक्षस शुम्भ निशुम्भ पैदा हुए,शुम्भ निशुम्भ ब्रह्मा जी को खाने के लिए दौड़ पड़े,तो ब्रह्मा जी अपने प्राण बचने के लिए विष्णु जी के पास गए,लेकिन विष्णु जी को योग निद्रा में लीन देख कर चिंतित हो गए,तब प्राण संकट में जान ब्रह्मा जी ने योगमाया की स्तुति प्रारम्भ की,ब्रह्मा जी की स्तुति से प्रसन्न हो कर देवी योगमाया भगवान् विष्णु जी के नेत्रों से निकल कर ब्रह्मा जी के सम्मुख उपस्थित हुयी,तब भगवान् विष्णु निद्रा से जागे और उनहोंने शुम्भ निशुम्भ का बध किया,यही योग माया निद्रा के रूप में सभी जीव जंतुओं को हर रोज नयी जीवनी शक्ति देती है,इसी देवी योगमाया को देवी स्वप्नेश्वरी कहा जाता है जो निद्रा की देवी मानी जाती हैं,देवी स्वप्नेश्वरी की यदि प्रसन्न हो जाएँ तो ये मन जाता है की ऐसा व्यक्ति सपनों में भविष्य की घटनाओं को देख सकता है,भक्त के स्वप्न पूर्ण होने लगते हैं,देवी की उपासना करने से लम्बी आयु और स्वास्थ्य तो मिलता ही है,देवी स्वप्नेश्वरी सोते हुए ही अपने भक्त के रोगों को नष्ट कर देती हैं,स्वप्नेश्वरी देवी की भक्ति पूजा करने वालों की स्मरण शक्ति गजब की होती है और ताउम्र बनी रहती है, नींद न आना एक गंभीर समस्या है, अनिद्रा से कई रोग पैदा हो सकते हैं, लम्बे समय तक अनिद्रा रहना बहुत ही घातक सवित हो सकता है, अनिद्रा से दायवितीज, डिप्रेशन, एंग्जाइटी, हाइपर टेंशन, गैस की समस्या, कन्स्तिपेशन, डार्कआई सर्कल्स, बॉडीऐक,भूख की कमी, हार्मोनल इम्बेलेंस, हार्ट डिजिजिस, नार्को लेपसी, के साथ साथ दिमाग की कार्य कशमता प्रभावित हो सकती है, इसके अतिरिक्त अवसाद, मनसताप, अति हर्ष विषाद, उन्माद, सम्भ्रमात्मकता, खिन्नता विक्षिप्तता, चिडचिडापन, क्रोध आदि भी पैदा होते हैं, कई बार गहरी नींद सोने पर भी नींद पूरी नहीं होती जिसके कई कारण हो सकते हैं, सोने का कमरा स्वच्छ हवादार न होना , तकिया बड़ा और असुविधाजनक होना,गलत दिशा में और असुबिधाजनक बिस्तर, अत्यंत तनाव अकेलापन और अज्ञात भय ,कोई शारीरिक बीमारी या अधिनिद्रा नाम का रोग नशे जैसी गलत आदतों के कारण नींद नहीं आती, चाय काफी का अधिक सेवन धूम्रपान आदि भी समस्या पैदा करते हैं, अनिद्रा दूर करने के लिए प्राणायाम करना चाहिए, भ्रामरी प्राणायाम और उद्गीथ प्राणायाम के साथ ही अनुलोम विलोम प्राणायाम करें, आँखों का नियमित व्यायाम करें,साफ पानी के छीटे दें, सूर्य भगवान् को अर्ध्य दें, स्वप्नेश्वरी देवी की पूजा करें व मंत्र जाप करें, इससे बुरे स्वप्न भी नहीं आयेंगे और स्वस्थ नींद का सुख उठा सकेंगे "स्वप्नेश्वरी देवी का मंत्र"-"शुक्ले महाशुक्ले ह्रीं श्रीं श्रीं अवतर स्वाहा।" मानसिक रूप से मंत्र का जाप करना चाहिए, हल्का व्यायाम करना न भूलें,बिना नींद बिस्तर पर न जाएँ, बिस्तर पर लेट कर टीवी नहीं देखें, नींद के लिए दवाओं का सहारा न लें,अन्यथा आप आदि हो सकते हैं, रात को भी अधिक तला हुआ भोजन न करें, भूख से अधिक कभी न खाएं, खाना खाने के करीब दो घंटे बाद ही सोने जाना चाहिए, भोजन में हरी सब्जियों का भरपूर प्रयोग करें, पानी का भी उचित मात्र में जरूर सेवन करें, नींद सही रीति से आये इसके लिए शय कक्ष में कुछ बदलाव करें, ये सुनिश्चित करें कि सर दक्षिण दिशा कि और न हो, हल्का संगीत धार्मिक संगीत सुनना या बांसुरी आदि बाद्य यंत्रों का संगीत सुनना लाभदायक, सोने के कुछ देर पहले पाँव धोने से भी अछि नींद आती हैं, जिन्हें बुरे सपने आते हों वे बाई करवट न सोयें, शराब, चरस, गुटका, तम्बाकू जैसे तमाम नशीले पदार्थों का परित्याग करें,अनियमित दिनचर्या न रखें ठीक समय पर सोये और उठें, ध्यान कि कुछ क्रियायों का ज्ञान प्राप्त कर ध्यान में उतरें, मोबाईल फ़ोन का प्रयोग कम करें व टीवी देखने का समय भी निश्चित ही रखें, सोने के कमरे में अधेरा होना चाहिए तेज रौशनी न रखें, लाल रंग का प्रयोग सोने के कमरे में कम करें, रात को रूम फ्रेशनर का प्रयोग बिलकुल न करें, देवी स्व्प्नेश्वरी कि मन ही मन पूजा करते हुए सोयें 

कौलान्तक पीठाधीश्वर 
महायोगी सत्येन्द्र नाथ

रंगों का कल्प बृक्ष-होली

posted Mar 17, 2011, 6:37 PM by Site Designer

होली रंगों का त्यौहार माना जाता है,होली प्रेम का भी पर्व है,प्राचीन प्रमुख प्रचलित कथा के अनुसार इस दिन विष्णु भक्त प्रल्हाद को जलाने की होलिका ने कोशिश की थी लेकिन अपनी भक्ति के कारण प्रल्हाद जीवित और बिना जले पूर्णतया सुरक्षित बाहर निकाल आये......आगम और निगम ग्रंथों में होली के पर्व का बहुत बड़ा महत्त्व लिखा गया है,इस दिन भक्त और साधक सिद्धियाँ प्राप्त कर कालजयी होने की शक्तियां प्राप्त करते हैं,यही वो दिन भी होता है जब हिमालय पर स्वर्ग से अप्सराएँ उतर कर कायाकल्प नाम की विद्या द्वारा अपनी सुन्दरता को और अधिक निखारती हैं, जब महादेव शिव ने कुपित हो कर कामदेव को तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया था, तो पुनः इसी दिन कामदेव का पुनर्जन्म हुआ, कथाओं के अनुसार भगवान् श्री कृष्ण जी ने इसी दिन पूतना नाम की राक्षसी को भी स्वर्ग पहुँचाया था, शैव पंथ की कथा के मुताबिक भगवान शिव के विवाह के पश्चात सभी शिव के बारातियों को शिव जी ने कैलाश बुला कर वरदान दिये, ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ था कि इतनी भारी भीड़ को मनोवांछित वर एक साथ दिये गए थे,तो सभी ने प्रसन्न हो कर एक दूसरे को रंगों से रंग दिया था, इस प्रकार होली के महापर्व के साथ अनेक कथाएं जुडी हैं, लेकिन इस दिन को महासिद्धि दिवस कहा जाता है, यदि आपकी कोई भौतिक या आध्यात्मिक इच्छा हो तो ये दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है, मोक्ष की इच्छा हो या इष्ट देवी देवता के दर्शनों की इच्छा, वशीकरण सम्मोहन हो या फिर रोगमुक्ति अथवा धन लाभ की आकांक्षा इस दिन, दिन भर और मध्य रात्री तक पर्वकाल होने से किया गया यज्ञ, मंत्र जप, दान, पूजा पाठ सबकुछ प्रदान करने में सक्षम हैं, होली को यदि रंगों का कल्प बृक्ष कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, होली के दौरान कुछ दिव्य प्रयोग गुरु निर्देश में अवश्य संपन्न करने चाहिए, ये प्रयोग इस काल में बहुत जल्द सिद्ध होते हैं, आइये जाने की कैसे होते हैं होली के सिद्ध प्रयोग---१) इष्ट दर्शन मंत्र प्रयोग---होली का सबसे महत्पूरण पक्ष है कि यदि आप सच्चे भक्त है बिना स्वार्थ के अपने इष्ट देवी देवता की कृपा पाना चाहते हैं तो इस दिन उनके मन्त्रों का जाप करें तो आप उनके दर्शन कर जीवन को कृतार्थ कर सकते हैं....... २) धनलक्ष्मी प्रयोग---यदि आप भौतिक दुनिया में धन वाहन घर पाना चाहते हैं तो भी ये दिन अद्भुत है इस दिन महालक्ष्मी जी के मन्त्रों का जाप कर पा सकते हैं स्थिर लक्ष्मी और वाहन भवन रोजगार एवं व्यापार में लाभ......३) आरोग्य प्रयोग---यदि आप किसी न किसी बिमारी से पीड़ित रहते हों या बिमारी नष्ट करने के लिए किसी मंत्र कि साधना काना चाहें तो आरोग्य मंत्र कि साधना एवं जाप से ये संभव है......४) भाग्य बर्धन प्रयोग---यदि आप कोई भी कार्य करते हों और उसे पूर्ण नहीं कर पाते, लगता हो कि भाग्य ही साथ नही दे रहा तो इस दिन भाग्य वर्धन मंत्र का जाप करें, जिसके फलस्वरूप आपका भाग्य बलवान हो कर आपका साथ देगा.....५) विद्या प्राप्ति प्रयोग---यदि आप विद्यार्थी हैं बहुत मेहनत करते हैं तब भी कुछ याद नहीं रहता,मेहनत के मुताबिक़ फल नहीं आता,आप परीक्षाओं में अच्छे अंक पाना चाहते हैं तो प्रतियोगिता  इंतर्वियु में सफल होना चाहते हैं तो होली के दिन माँ सरस्वती के विद्या प्राप्ति मंत्र का जाप करना चाहिए......६) सर्व जन आकर्षण प्रयोग---यदि आप राजनेता हैं, शिक्षक या समाज सुधारक है, भारी भीड़ को संबोधित करते हैं तो आप होली के दिन सर्व जन आकर्षण मंत्र का प्रयोग करें जिससे कि सब आपकी और आकृष्ट हो कर आपको पसंद कंरने लगेंगे, आपको गौर से सुनेंगे......७) तंत्र बाधा नाशक प्रयोग---यदि आप पर किसी ने जादू टोना कर रखा हो या किसी कि बुरी नजर लगी हो,अथवा घर में कोई नकारात्मक शक्तियाँ हो तो तंत्र बाधा नाशक मंत्र का जाप करें,सभी प्रकार के भूत प्रेत जादू टोने टोटके से मुक्ति मिलती है,नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव नष्ट होते हैं.....८) अकाल मृत्यु नाशक प्रयोग---यदि इस दिन महामृत्युंजय मंत्र के तांत्रोक्त बीज मन्त्रों का जाप किया जाए तो अकाल मृत्यु नष्ट होती है.......

                                                                                

चन्द्रमा से जुडी मान्यताएं

posted Mar 17, 2011, 6:23 PM by Site Designer

चन्द्रमा को सुख शांति का कारक माना जाता है....लेकिन यही चन्द्रमा जब उग्र रूप धारण कर ले तो प्रलयंकर स्वरुप दिखता हैं, तंत्र ज्योतिष में तो ये कहावत है की चन्द्रमा का पृथ्वी से ऐसा नाता है कि मानो माँ बेटे का सम्बन्ध हो, जैसे बच्चे को देख कर माँ के दिल में हलचल होने लगती है, वैसे ही चन्द्रमा को देख कर पृथ्वी पर हलचल होने लगती है, चन्द्रमा जिसकी सुन्दरता से मुग्ध हो कवि रसीली कविताओं और गीतों का सृजन करते हैं वहीँ भारतीय तंत्र शास्त्र इसे शक्तियां अर्जित करने का समय मानता है, आकाश में पूरा चाँद निकलते ही कई तांत्रिक सिद्धियाँ प्राप्त करने में जुट जाते हैं, यही नहीं बड़े बड़े योगी भी हिमालयों पर पूरण चन्द्र के प्रकाश में कुण्डलिनी जागरण संपन्न करते हैं, चन्द्रमा प्राकृतिक तौर पर बहुत सूक्ष्म प्रभाव डालता है जिसे साधारण तौर से नहीं आँका जा सकता लेकिन, लेकिन कई बार ये प्रभाव बहुत बढ जाता है जिसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन ये प्रभाव का बढ़ना विनाशकारी ही होता है, ज्योतिष शास्त्र इसके सम्बन्ध में कहता है कि चन्द्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर भूकंप, समुद्री आंधियां, तूफानी हवाएं, अति वर्षा, भूस्खलन आदि लाता हैं, रात को चमकता पूरा चाँद मानव सहित जीव जंतुओं पर भी गहरा असर डालता है, शास्त्रों के अनुसार भी चन्द्रमा मन का कारक है। चन्द्रमा दिल का स्वामी है। चांदी की तरह चमकती रात चन्द्रमा का विस्तार राज्य है। इसका कार्य सोने चांदी का खजाना शिक्षा और समृद्धि व्यापार है। चन्द्रमा के घर शत्रु ग्रह भी बैठे तो अपने फल खराब नहीं करता। प्रकृति की हलचल में चन्द्र के प्रभाव विशेष होते हैं। चन्द्रमा से ही मनुष्य का मन और समुद्र से उठने वाली लहरे दोनों का निर्धारण होता है। माता और चन्द्र का संबंध भी गहरा होता है। मूत्र संबंधी रोग, दिमागी खराबी, हाईपर टेंशन, हार्ट अटैक ये सभी चन्द्रमा से संबंधित रोग है। लाल किताब कहती है कि  चन्द्रमा शुभ ग्रह है. यह शीतल और सौम्य प्रकृति धारण करता है. ज्योतिषशास्त्र में इसे स्त्री ग्रह के रूप में स्थान दिया गया है. यह वनस्पति, यज्ञ एवं व्रत का स्वामी ग्रह है, भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हों, उसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है। भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैं, वह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियों, जन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों, परा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, होटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों, सागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं। चन्द्रमा, पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 27 दिन और 8 घंटे में पूरी करता है और इतने ही समय में अपने अक्ष पर एक घूर्णन करता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई पड़ता है। पृथ्वी से चन्द्रमा का 57% भाग देखा जा सकता है। चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी के चारो ओर घुमने में लगा समय (परिभ्रमण काल) 27 घंटा 7 मिनिट 43 सेकंड है,ज्वार उठने के लिए अपेक्षित सौर एवं चन्द्रमा की शक्तियों के अनुपात 11:5 हैं।ओपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाए गए चट्टानों से पता चला है कि चन्द्रमा भी उतना ही पुराना है, जितनी की पृथ्वी (लगभग 460 करोड़ वर्ष)। इसकी चट्टानों में टाइटेनियम की मात्रा अत्यधिक मात्रा में पायी गयी है। असल में चन्द्रमा सृष्टि का इतना महत्त्वपूर्ण तत्त्व है कि इसकी उपेक्षा की ही नहीं जा सरता । सूर्य और चन्द्र या सोम इन्हीं दो तत्त्वों के विमर्श, संघर्ष और समन्वय से सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है। सोम तत्त्व बहुत ही महत्त्वपूर्ण दार्शनिक पारिभाषिक शब्द है। यह सामान्यतया शीतलता, जल, दुग्ध, औषधि- जैसे स्थूल तथा ममता, दया, वात्सल्य, शालीनता यानी तमाम सौकुमार्य जैसे सूक्ष्म तत्त्वों का स्त्रोत है । “चन्द्रमा जीवन का स्त्रोत है । यह अपस् यानी जय का शासक है। और यही जल सारी सृष्टि में संचरित होकर सभी जीवधारियों का पोषण करता है, उन्हें जीवित रखता है। चन्द्रमा को जहाँ सौम्य गृह मन जाता है वहीँ लक्षण शास्त्रों सहित उल्लूक काक तंत्र सहित लक्षण ज्योतिषीय ग्रन्थ अति शक्तिशाली भी मानते हैं, कहा जाता है की चन्द्रमा पृथ्वी को अपनी शक्ति से मैथ देता है, क्योंकि सागर से चन्द्रमा की उत्पत्ति बताई गयी है, इसलिए जल को सबसे अधिक प्रभावित करता है, भूमि से उत्त्पन्न हुआ है तो अपने सम्मोहन से धरती को अपनी और खींचता है,जिससे पृथ्वी पर रहने वालों पर मुसीवाते आ सकती हैं,हाल ही में 19 मार्च को चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट आ रहा है, जिसे पहले ही ज्योतिष के अनुसार अशुभ करार दे दिया गया था,क्योंकि चंद्रमा के निकट आने से पृथ्वी पर उथल पुथल होती ही है,जब भी चाँद निकट आने लगता है और दूर होने लगता है तो ये काल ऋतुओं को जीवों को मानवों को तो प्रभावित करता ही है साथ ही साथ प्रकृति को भी मथ कर रख देता है,
                                                                                                                      

केवल गुरु ही तुम्हारी सहायता कर सकता है

posted Mar 17, 2011, 6:23 PM by Site Designer

साधना पथ बहुत निराला होता है, इसे साधारणतया समझ पाना असंभव सा लगता है क्योंकि साधना की जटिलता विचित्रता बहुत रहस्यमय है, लेकिन ये भी इश्वर कि कृपा ही है कि मनुष्य चाहे पढ़ा लिखा हो या न हो लेकिन प्रभु कृपा उसे इन सभी विषयों को ऐसे समझा देते है कि शायद समझाने कि जरूरत ही नहीं है, साथ ही ये प्रकृति ऐसी विचित्र है कि ऐसा लगता है मानो सब कुछ हमारे लिए ही बना है, उस पर अपनी नित्यता का बोद्ध, कि हम तो अमर हैं हमें किसी चीज कि फिक्र क्यों हो, हम तो सदा जीने वाले हैं, एक और विचार दोसरी और ढलती आयु, लेकिन इन सबके बीच भी ईश्वर का नाम एक सहारा है, ऐसा सहारा कि जो दिखाई नहीं देता लेकिन शायद उसकी मजबूती हम सबको महसूस होती है, ये सच है कि इस संसार में जीना भी सरल कार्य नहीं है, भोजन घर परिवार समाज के अनेकों उत्तरदायित्व हम पर होते हैं, बिना रोटी के तो शरीर भी नहीं चलता, बिना काम के जीवन का अर्थ भी समझ नहीं आता, आम आदमी सोचता है कि काश मैं सन्यासी होता क्योंकि परिवार धन और सांसारिक झंझट नहीं होते तो ईश्वर का नाम सुमिर लेता, उधर सन्यासी को पता चलता है कि अरे! ये क्या मैंने तो सोचा था कि गृहस्थी छूती तो मुक्ति, लेकिन सन्यासी होने के बाबजूद भी भोजन तो चाहिए, वस्त्र तो चाहिए, पहले तो केवल परिवार था अब तो बहुत से भक्तों के दुःख भी साथ हो लिए, और ईश्वर कि सच्ची अनुभूति भी नहीं, जीवन उस घोड़े कि तरह है जिसे दूसरे किनारे की घास ज्यादा हरी प्रतीत होती है, सन्यासी को गृहस्थी पसाद होती है और गृहस्थी को सन्यास, लेकिन सार तो यही है कि दोनों ही तब तक अपूरण हैं जब तक कि सच्ची अनुभूति न हो ज्ञान न हो, पढ़े हुए ज्ञान की बात नहीं है, अनुभूति जन्य ज्ञान की बात कर रहा हूँ, ईश्वर की अनुकम्पा को समझना सबके लिए इस लिए भी संभव नहीं क्योंकि बुद्धि चक्र बीच में आ जाता हैं और अध्यात्म का भक्ति मार्ग विशुद्ध ह्रदय चक्र द्वारा संचालित होता है, इसी लिए भक्ति पथ निराला होता है, हम जैसे दुनिया को समझते हैं वैसे ही अध्यात्म और गुरु को भी समझने की कोशिश करते हैं और यहीं चूक हो जाती है, क्योंकि संसार बुद्धि का विलास है, इसलिए ये सोच लेना कि धर्म ग्रंथों को रट लिया तो स्वर्ग का टिकेट रिजर्व हो गया अत्यंत मूढ़ता होगी, क्योंकि सब बुद्धि का खेल है, इसीलिए ये कहा जाता है कि राम से बड़ा राम का नाम क्योंकि राम ने जीवन में जो किया तुम उसमें भी गलतियाँ निकाल सकते हो, लेकिन जब राम को भूल कर तुम केवल राम का नाम लेते हो तो वहां बुद्धि हट जायेगी और तुम राम को पाने लगोगे क्योंकि हृदय चक्र खिल उठेगा, भक्ति विशुद्ध ह्रदयवादी मार्ग है और यही मार्ग जीवन को अमरत्व कि राह पर ले जाता है, लेकिन धर्म से तुम तब तक भागते रहोगे जब तक तुम प्रेम विहीन हो, याद रखना जिस दिन जीवन में प्रेम की घटना घट जाए, तुम सन्यासी हो जाओगे, तुम नाम से भी पार हो कर चैतन्य हो जाओगे, और आज का आखिरी सूत्र कि ह्रदय चक्र को खोलने में केवल एक ही व्यक्ति तुम्हारी सहायता कर सकता है, वो है गुरु, जो स्वयं शिव हैं.....

एक अनूठे व्यक्तित्व हैं कौलान्तक नाथ

posted Mar 17, 2011, 10:43 AM by Site Designer   [ updated Mar 17, 2011, 11:03 AM ]

(यहाँ पाठकों को ये बताना चाहेंगे की तुमड़ी बाबा काफी बड़ी आयु के सिद्ध योगी हैं,जो महायोगी जी को करीब चौदह सालों से जानते हैं,तथा महायोगी को अपना बरिष्ठ गुरु भी कहते हैं,क्योंकि महायोगी जी के 38 गुरुओं में से एक शान्किरी योगिनी के ये भी शिष्य हैं,ये महायोगी जी से मिलने आये हुए थे कि मुझे बात करने का सुअवसर मिल गया,इनके शब्दों को ही, जितना याद रहा, मैं लेख के रूप में दे रहा हूँ)
-कुमुदवल्ली
-अरे लोगों के मन में साधू सन्यासी या योगियों की एक छवि होती है,लेकिन महायोगी की छवि बनाना किसी के बस में नहीं,इनका असली व्यक्तित्व तो बहुत ही छिपा और गोपनीय है, इनको कौलान्तक नाथ के नाम से हिमालयों पर इनको सब पहचानते हैं, इन विराट योगी का जीवन कई अद्भुत रहस्यों से भरा है,सबसे पहले तो ये कि सबसे पुरानी परंपरा से जुड़े हैं,ऐसी परम्परा से जिसे जानने वाले भी बहुत कम शेष बचे हैं,फिर गुप्त कुल की सभी शक्तियों की साधना कर इन्होंने साधना क्षेत्र में इतिहास कायम किया है,जिसका महत्त्व आंकने वाला कम से कम भौतिक संसार में कोई नहीं हो सकता,अपर मंडल कि 48 देवियाँ हों या परात्पर मंडल के 26 शिव,कहा जाता है कि हिमालय में लम्बा नाथ योगी, योगी हरिरस, त्रिजटा अघोरी, विशुद्धानंद, परमहंस निखिलेश्वरानंद, सुन्दर नाथ, गोला लामा , मुनि उज्जवल हंस, जैसे चुनिन्दा लोग ही परात्पर शिव कि साधना में परांगत हो सके थे, लेकिन इनमें से भी कोई अपर मंडल देवियों तक नहीं पहुँच पाया,लेकिन कौलान्तक नाथ को ये गौरव मिला है वो भी कठोर तप के बाद,कौलान्तक नाथ को आप महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज के नाम से जानते हैं,जो आम आदमी से भी साधारण लगते हैं,कभी उनको देख किसी ने ये नहीं सोचा होगा कि वो किस से बात कर रहे हैं,कौलान्तक नाथ बर्तमान भारत में साधना जगत के सर्वोत्तम रत्न हैं,लेकिन साधना काल में उनकी हठ धर्मिता ने जहाँ उनको साधना शिखर तक पहुंचा दिया वहीँ कुछ हानिया भी कौलान्तक नाथ की झोली में पड़ी, सबको सहते हुए योगी आज समाज में एक नये रूप में जीने का प्रयास कर रहे हैं,लेकिन हिमालय के सभी उच्चतम योगिओं को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि कौलान्तक नाथ यूँ भौतिक संसार में लोगों के बीच घूमें, हाल ही में हिमालय से महायोगी जी को वापिस लौटने का एक गुप्त सन्देश भेजा गया था,जिसे महायोगी ने ये कह कर नकार दिया कि मैं अभी कोशिशों में लगा हूँ, कहा जाता है कि कुल्लू में किसी पूर्व जन्म कि साधिका के पास महायोगी रहा करते थे,लेकिन उसके पुण्य समाप्त होने पर उनको मायाबश वहां से जाना पड़ा,हिमालयों से कौलान्तक नाथ के दूर जाते ही सूक्ष्म जगत में खलवली हैं,ये सूचना मैं तुमसे यहाँ सांझा कर रहा हूँ कि उनको वापिस नहीं लौटने पर महागुरु से दण्डित होना पड़ सकता है,क्योंकि कई वर्षों पहले उनको महागुरु ने कुछ काम पूरे करने को दिए थे, जिसे पूरा करने के लिए वो हर परेशानी से गुजरे,समाज नें उनसे अच्छा व्यवहार नहीं किया,तो अब महागुरु से ये देखा नहीं जा रहा,उनहोंने महायोगी को अब कहा है कि पहले बाली बातें भूल जाओ तुम लौट आओ,दरअसल महागुरु को ये भय सता रहा है कि संसार में रह कर महायोगी परेशानियों के कारण लम्बे समय तक जी नहीं पायेंगे,और शायद बहुत ही कम लोग ये जानते होंगे कि महायोगी जी अभी भी बुरे दौर से गुजर रहे हैं, जिसके कारण हिमालय की जोगिनियों में असंतोष व्याप्त है, तो ऐसे में कौलान्तक नाथ का लौटना ही बेहतर रहेगा, मैं भी इसी हक़ में हूँ, लेकिन महायोगी मांनेगे नहीं धुन के पक्के हैं,लेकिन मुझे ये बताना अच्छा लगेगा कि
महायोगी अनूठे व्यक्तित्व हैं,सबसे ऐसे मिलते हैं कि मानो उनका अपना ही हो,लेकिन बदले में समाज का रुख? हालांकि महायोगी पर गुरुओं ने ज्यादा लोगों से मिलने जुलने पर पावंदी लगाई हुई है,पर महायोगी ने इसका भी हल आखिर निकाल ही लिया जब पिछले दिनों कई सालों के बाद में कौलान्तक नाथ से मिला तो देखा कि अब तो वो टीवी पर आने लग गए हैं,लोग उनको खूब मानते भी हैं गृहस्थ भक्तों की भी कमी नहीं है, लेकिन बाहर से शांत प्रसन्न दिखने वाले योगी महायोगी किंचित तनाव ग्रस्त लगे,मुझे यकीन ही नहीं होता की वाल्यकाल से अद्भुत क्षमताओं सहित पैदा हुए कौलान्तक नाथ समाज में क्या कर रहे हैं?दिव्या योगियों को उनकी आवश्यकता है,संसार में गालियाँ सुनने का ज्यादा शौक ठीक नहीं है,इससे हिमालय के योगियों को दुःख होगा,मुझे ही देख लो में इस संसार को भली तरह देख चूका हूँ,निंदा बुरे फालतू के आरोप लगाने के सिवा यहाँ लोगों को कुछ आता ही नहीं,समझेंगे नहीं तो यहाँ कई दुष्ट है कौलान्तक नाथ को तंग करना उनके लिए बाएं हाथ का खेल है,फिर बिना आश्रम और ठिकाने के इतने साल निकाल लेना भी काबिले तारीफ है,मुझ जैसे साधक को बस इतनी चिंता है की बस हमारे कौलान्तक नाथ को कोई दुःख न पहुंचे वो दुष्टों से बचे रहें,हो सके तो चुपचाप लौट आयें ताकि हम सन्यासी योगियों को उनसे दिव्या विद्याएँ ग्रहण करने का मौका मिले, मैंने इनसे शक्तिपात लिया था और कई साधनाएँ सीखी हैं अब ब्रम्ह पात पाने की इच्छा है,न जाने कब इतनी कृपा होगी कि कौलान्तक नाथ मुझे इसके काविल समझें,पर ये जरूर है कि ऐसा महापुरुष कुछ सोच विचार कर ही संसार में विचरण करता है अन्यथा इनको हिमालय से उतरने कि जरूरत ही नहीं होती,काश मैं भी इनके साथ रह सकता,कितनी बार इनसे प्रार्थना कि पर मानते ही नहीं,और मुझे इनका साथ मिल ही नहीं पाटा,मिलता है तो इतना कम कि लगता है कि कुछ मिला ही नहीं,न जाने कितनी विद्याएँ इनके पास हैं,आप लोग किस्मत वाले हैं और महायोगी के लिए तो यही कहूँगा कि वो अनूठे व्यक्ति हैं और हिमालय की  शान हैं,हम सबके प्यारे हैं,
-तुमड़ी बाबा

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